एक विदेशी मुद्रा ब्रोकर चुनना

प्रचलित मुद्राओं की सूची

प्रचलित मुद्राओं की सूची

प्रचलित मुद्राओं की सूची

________________ विषयानुक्रमणिका अध्याय-1 : मुद्रा का स्वरूप एवं उसकी अवधारणाएँ 1-8 अध्याय - 2 : मुद्रा योग के प्रकार एवं वैज्ञानिक परिशीलन 1. मुद्राओं के प्रकार 2. 3. 4. 6. 8. 10. विविध ग्रन्थों के परिप्रेक्ष्य में मुद्रा योग का वैशिष्ट्य मुद्रा योग प्रचलित मुद्राओं की सूची की आवश्यकता एवं उपादेयता ध्यान और मुद्रा 5. आसन और मुद्रा वर्गणा और मुद्रा हठयोग और मुद्रा 7. देवी-देवता और मुद्रा 9. मुद्रा योग के लाभ मुद्रा योग का रहस्य 11. हस्त मुद्रा का रहस्य विज्ञान 1. मुद्रा योग का ऐतिहासिक अनुसन्धान जैन एवं इतर परम्परा में उपलब्ध मुद्राओं की सूची एवं तुलनात्मक अध्ययन नाट्य परम्परागत मुद्राओं की सूची एवं तुलना । जैन ग्रन्थों में वर्णित मुद्राओं की सूची एवं तुलना। हिन्दू ग्रन्थों में प्रतिपादित मुद्राओं की सूची एवं तुलना। बौद्ध परम्परा में प्रचलित मुद्राओं की सूची एवं तुलना । योग साधना में मुख्य उपयोगी मुद्राओं की सूची । 6. आधुनिक चिकित्सा में प्रचलित मुद्राओं की सूची । 2. 3. 4. 5. अध्याय-3: अध्याय - 4: अध्याय - 5 : उपसंहार सहायक ग्रन्थ सूची 9-36 37-44 45-81 82-89 90-94

जलवायु

इस जिले की जलवायु इसकी सूखापन और तापमान के चरम सीमाओं और दुर्लभ वर्षा पर निर्भर करती है। वर्ष को चार सत्रों में विभाजित किया जा सकता है नवंबर से मार्च तक ठंड का मौसम और मार्च के बाद जून के अंत तक गर्मियों का मौसम रहता है। जुलाई से सितंबर के मध्य तक और सितंबर से अक्टूबर तक की अवधि क्रमशः दक्षिण पश्चिम मानसून के बाद के मौसम का गठन करते हैं।

जिले में बारिश के रिकॉर्ड केवल सिरसा के लिए पर्याप्त रूप से लंबी अवधि के लिए उपलब्ध हैं। जिले में औसत वार्षिक वर्षा 32-53 मिमी है। सामान्यत: पश्चिम से पूर्व तक जिले में वर्षा होती है जिले में सालाना सामान्य वर्षा का लगभग 72 प्रतिशत हिस्सा दक्षिण पूर्व मानसून की अवधि, जुलाई से सितंबर, जुलाई और अगस्त के मध्य बारिश के महीनों के दौरान प्राप्त होता है। जून के महीने में बारिश की महत्वपूर्ण मात्रा है,शेष वर्ष में, बहुत कम वर्षा होती है।

जिले में कोई मौसम संबंधी सुचना नहीं है, इसलिए गंगानगर और हिसार में प्रचलित प्रचलित मौसम संबंधी स्थितियों को जिले में प्रचलित उन लोगों के प्रतिनिधि के रूप में लिया जा सकता है जो सामान्य रूप में है। फ़रवरी के बाद तापमान में तेजी से वृद्धि होती है मई और जून के दौरान औसत दैनिक अधिकतम तापमान 41.5 डिग्री सेल्सियस से 46.7 डिग्री सेल्सियस तक बदलता रहता है। व्यक्तिगत दिनों में गर्मी के मौसम में अधिकतम तापमान 49 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है और जून के अंत तक, दिन के तापमान में काफी गिरावट आती है और दिन के दौरान मौसम ठंडा हो जाता है, लेकिन गर्मियों के मौसम के दौरान रातें गर्म होती हैं।

मानसून के मौसम के दौरान, आकाश में ज्यादातर मामूली रूप से भारी बादलों से घिरा होता है। या। ठंड के मौसम में पश्चिमी गड़बड़ी को पारित करने के साथ-साथ एक या दो दिन की संक्षिप्त अवधि के लिए बादल छाए रहते हे

मुक्तिबोध: ज़माने के चेहरे पर…ग़रीबों की छातियों की ख़ाक है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: मुक्तिबोध ने आज से लगभग छह दशक पहले जो भारतीय यथार्थ अपनी कविता में विन्यस्त किया था, वह अपने ब्यौरों तक में आज का यथार्थ लगता है. The post मुक्तिबोध: ज़माने के चेहरे पर… ग़रीबों की छातियों की ख़ाक है appeared first on The Wire - Hindi.

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: मुक्तिबोध ने आज से लगभग छह दशक पहले जो भारतीय यथार्थ अपनी कविता में विन्यस्त किया था, वह अपने ब्यौरों तक में आज का यथार्थ लगता है.

गजानन माधव मुक्तिबोध. [जन्म: 13 नवंबर 1917 – अवसान: 11 सितंबर 1964] (फोटो साभार: विकीपीडिया)

एक कला-वीथिका ने कुछ दिनों पहले ‘भाषा, रूप और स्मृति’ पर एक खुली बातचीत रखी जिसमें समाज-चिंतक आशीष नंदी, चित्रकार मनीष पुष्कले और मैंने भाग लिया. शुरुआत मैंने कुछ स्थापनाओं से की. भाषा रूप है जिसमें स्मृति अनुगुंजित होती रहती है. न तो भाषा, न ही स्मृति बिना किसी रूप के संभव है.

स्मृति रूप और भाषा में ही प्रायः रहती है, अन्यत्र बहुत कम. हमारे समय में लगभग रोज़ीना भाषा और स्मृति पर हमले हो रहे हैं. भाषा को निरे उपकरण में और स्मृति को विस्मरण में बदला जा रहा है. कलाएं स्मृति को अंगीकार करती हुई वैकल्पिक भाषाएं विकसित करती हैं. यह तो संभव है कि बिना भाषा या स्मृति के रूप हो पर तब वह निरर्थक होगा, उसमें अर्थ की कोई संभावना नहीं हो सकती.

क्या भाषा का काम स्मृति के बिना चल सकता है? क्या स्मृति का काम भाषा के बिना चल सकता है? कोई भी कला, बिना जीवन और भाषा के, संभव नहीं- शब्दों की भाषा, रंग-रेखाओं की भाषा, स्वरों की भाषा, भाव-भंगिमाओं की भाषा आदि.

बातचीत में अनेक पक्ष उभरे. आशीष जी ने इस ओर ध्यान दिलाया कि सर्जनात्म्क विधाएं हैं जैसे कविता, संगीत, गणित जिनमें सर्जना के चरम क्षणों में माध्यम और प्रयोक्ता इतने तदात्म हो जाते हैं कि उनमें कोई दूरी या अंतर नहीं रह जाता: तब कविता या संगीत खुद अपने को ही रचने लगता है. मैंने इसकी पुष्टि में यह प्रसंग जोड़ा जिसमें उस्ताद अली अकबर खां ने कहा था कि कुछ देर तो वे सरोद बजाते हैं और फिर सरोद उन्हें बजाने लगता है.

मनीष ने याद किया कि रज़ा साहब कहते थे कि बिना दिव्य शक्तियों के सहयोग के अच्छी कला संभव नहीं है. यह भी प्रवाह में आया कि रचना-प्रक्रिया में सब कुछ पूरी तरह से ज्ञेय या स्पष्ट नहीं होता और कुछ-न-कुछ रहस्मय बना रहता है. यह कोई रूमान नहीं है, यह सर्जना की सचाई है.

जिन्हें सब कुछ पहले से पता होता है कि कहां और कैसे जाना है वे प्रायः अच्छी कला की रचना नहीं कर पाते. लिखना या रचना बंधे-बंधाए रास्तों पर चलना नहीं, पगडंडियों और कई बार वर्जित मार्गों पर भटकना होता है. उसमें जोखिम होता है पर बिना जोखिम के सर्जना नहीं होती.

बातचीत में सुनने-गुनने के लिए थोड़े-से लोग थे. पर उन्होंने मनोयोग से सुना. ऐसे आयोजन अधिक होने चाहिए ताकि कलाकार, चिंतक और रसिकता के बीच आत्मीय संवाद हो, दूरी या द्वैत के बजाय हम आहंगी और तादात्म्य बढ़े और पुष्ट हो. इस कुसमय में सारे बड़े संवाद झगड़ों या तमाशों में घटाए जा चुके हैं. इस समय ऐसे छोटे आत्मीय संवादों की बड़ी ज़रूरत है.

तीज-त्योहार और कविता

कई बार क्रिसमस के अवसर पर पोलैंड या फ्रांस में रहने का अवसर मिला. उस समय कहां पुस्तकों की दुकानों में क्रिसमस पर कविताओं के नए संचयन प्रदर्शित होते थे और उनमें इधर लिखी ताज़ा कविताएं भी संकलित होती थीं. बड़े पश्चिमी कवियों ने, जिनमें यीट्स, इलियट, चेश्वाव मीवोष, फिलिप लार्किन आदि शामिल हैं, अपने तीज-त्योहारों पर कविताएं लिखी हैं.

चूंकि इन दिनों, भारत में त्योहारों को लेकर बड़ी चहल-पहल, रौनक और व्यापार हो रहे हैं, यह सोचना शुरू किया कि हिन्दी की खड़ी बोली कविता में पिछले लगभग सौ बरसों में तीज-त्योहारों को लेकर कितनी कविताएं हैं. लगा कि बहुत नहीं हैं, शायद इतनी भी नहीं कि उन्हें एक संग्रह में एकत्र किया जा सके.

दीवाली की बड़ी जगमगाहट है पर दीवाली पर हमारे पास कितनी सुंदर कविताएं हैं जो दीप-सुषमा, दीप-वैभव आदि को स्मरणीय ढंग से व्यक्त करती हों? उर्दू में अकेले नज़ीर अकबराबादी ने सभी हिंदू तीज-त्योहारों और देवताओं पर इतनी सारी कविताएं लिखी हैं कि उनके मुक़ाबले में किसी हिन्दी कवि को खड़ी बोली में खड़ा ही नहीं किया जा सकता.

पिछले लगभग सात-आठ दशकों से कविता में साधारण जनजीवन, अपनी लोक रंगतों-लयों-छबियों-अंतरध्वनियों में व्यक्त-विन्यस्त हुआ है. पर हमारे तीज-त्योहार इस कविता-विन्यस्त जन-जीवन में इतने कम और धूमिल क्यों है?

याद आता है कि अकेले कुंभ मेले को लेकर जब निर्मल वर्मा ने एक लंबा संस्मरण लिखा था तो बड़ा बवाल मचा था और आज भी उसे विवादास्पद किया जाता है, जबकि त्रिलोचन की कुंभ मेले पर कविताओं का लगभग कोई नोटिस ही नहीं लिया गया.

क्या हमारे बीच एक अघोषित पर सशक्त वर्जना सक्रिय है कि तीज-त्योहार हमारे पिछड़ेपन के अनुष्ठान हैं और इनमें हमें अपने को दूर ही रचना चाहिए. यह दूरी सिर्फ़ साहित्य में है क्योंकि बाक़ी निजी और सामाजिक जीवन में अधिकांश कवि और लेखक ये तीज-त्योहार मनाते ही हैं. यह कार्य-विभाजन है या एक प्रचलित मुद्राओं की सूची अधिकतर अलक्षित पाखंड?

ज़ाहिर है इस मामले को किसी दो टूक ढंग से नहीं समझाया जा सकता. इसका कुछ न कुछ मूल हमारी भारतीय आधुनिकता में है जिसमें हम सब, कई बार अचेत ढंग से, शामिल हैं. पश्चिम जगत का आधुनिक नागरिक किसी ईसाई अभिप्राय, रूढ़ि, अनुष्ठान या त्योहार पर निस्संकोच लिख सकता है और उसे पिछड़ा या कम आधुनिक नहीं माना जाता.

लेकिन हमारे यहां यह संकोच है, गहरा है और हमारे जनजीवन के प्रामाणिक चित्रण से, इसलिए, शायद बाहर है. हर अनुष्ठान को असह्य भौंडे तमाशे में बदल देने वाली राजनीतिक शक्तियां क्या इस ख़ालीपन का लाभ उठा रही हैं? इस पर कुछ गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है.

105 के मुक्तिबोध

अगर वे जीवित होते तो गजानन माधव मुक्तिबोध की आयु आज 13 नवंबर 2022 को 105 बरस की होती. वे उन थोड़े से आधुनिक प्रचलित मुद्राओं की सूची मूर्धन्यों में से हैं जिन्हें लंबा और सार्थक उत्तरजीवन मिला है. अपनी मृत्यु के समय सितंबर 1964 में उनकी आयु 47 की भी नहीं हो पाई थी और उनका पहला कविता-संग्रह भी उनके देहावसान के बाद ही प्रकाशित हो पाया.

यह बात थोड़ा चकित करती है कि आज से लगभग छह दशकों पहले उन्होंने जो भारतीय यथार्थ अपनी कविता में विन्यस्त किया था वह अपने ब्यौरों तक में आज का यथार्थ लगता है. उनकी कविता ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ की पंक्तियां हैं:

‘… रात के जहांपनाह/इसीलिए आजकल/दिन के उजाले में भी अंधेरे की साख है/ इसीलिए संस्कृति के मुख पर/मनुष्यों की अस्थियों की राख है/ज़माने के चेहरे पर/ग़रीबों की छातियों की ख़ाक है.’

एक और कविता ‘कहने दो उन्हें जो कहते हैं’ में पंक्तियां हैं:

‘कहीं नहीं, कहीं नहीं,/पूनों की चांदनी यह सही नहीं सही नहीं, केवल मनुष्यहीन वीरान क्षेत्रों में,/निर्जन प्रसारों पर/सिर्फ़ एक आंख से, ‘सफलता’ की आंख से/दुनिया को निहारती फैली है,/पूनों की चांदनी.’

आगे सभी कविता में जो बिंब है वह हमारे समय का विकराल-भयावह बिंब लगता है:

… बैठा है, खड़ा है कोई
पिशाच एक ज़बर्दस्त मरी हुई आत्मा का,
वह तो रखवाला है
घुग्घू के, सियारों के, कुत्तों के स्वार्थों का.

और उस जंगल में, बरगद के महाभीम
भयानक शरीर पर खिली हुई फैली है पूनों की चांदनी
सफलता की, भद्रता की,
श्रेय-प्रेय-सत्यं-शिवं-संस्कृति की
खिलखिलाती पूनों की चांदनी.

अगर कहीं सचमुच तुम
पहुंच ही वहां गए
तो घुग्घू बन जाओगे
सियार बन जाओगे.
आदमी कभी भी फिर
कहीं भी न मिलेगा तुम्हें…

Chandra Grahan 2022: सेक्स से परहेज से लेकर स्नान करने तक, जानें चंद्र ग्रहण से जुड़े कुछ मिथक

वैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आती है तो चंद्र ग्रहण होता है, लेकिन ज्योतिष शास्त्र में इससे जुड़ी अनेकों मान्यताएं प्रचलित हैं. चंद्र ग्रहण के दौरान कई ऐसे कार्य बताए गए हैं, जिन्हें वर्जित माना जाता है और ये मान्यताएं सदियों से चली आ रही हैं.

Chandra Grahan 2022: सेक्स से परहेज से लेकर स्नान करने तक, जानें चंद्र ग्रहण से जुड़े कुछ मिथक

Chandra Grahan 2022: आज यानी 8 नवंबर 2022 को साल का आखिरी चंद्र ग्रहण (Chandra Grahan) लगने जा रहा है. भले ही विज्ञान चंद्र ग्रहण को एक खगोलीय घटना मानता हो, लेकिन ज्योतिष शास्त्र में चंद्र ग्रहण की घटना को शुभ नहीं माना जाता है और इसके प्रत्येक मानव जीवन पर कोई न कोई प्रभाव देखने को मिलते हैं. वैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो जब पृथ्वी सूर्य (Surya) और चंद्रमा (Chandra) के बीच आती है तो चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) होता है, लेकिन ज्योतिष शास्त्र में इससे जुड़ी अनेकों मान्यताएं प्रचलित हैं. चंद्र ग्रहण के दौरान कई ऐसे कार्य बताए गए हैं, जिन्हें वर्जित माना जाता है और ये मान्यताएं सदियों से चली आ रही हैं. आइए जानते हैं सेक्स (Sex) से परहेज करने से लेकर स्नान (Bathing) करने तक चंद्र ग्रहण से जुड़े कुछ मिथक…

हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पाप ग्रह राहु जब सूर्य या चंद्रमा को निगलता है तो उससे चंद्रमा या सूर्य को ग्रहण लगता है. इस दौरान कहा जाता है कि लोगों को सेक्स करने से परहेज करना चाहिए या फिर जानवरों पर बैठने से बचना चाहिए, क्योंकि ग्रहण के दौरान ऐसे किसी को कार्य को करने से नुकसान पहुंच सकता है. इसके साथ ही ग्रहण के बाद स्नान करने की सलाह दी जाती है, ताकि ग्रहण काल के दौरान फैली नकारात्मक ऊर्जा से बचा जा सके. यह भी पढ़ें: Chandra Grahan 2022 in India: प्रसार भारती और नासा के अनुसार भारत के अधिकांश शहरों में दिखेगा रक्तिम चंद्रमा की दिव्य आभा! जानें कैसे मिलता है चंद्रमा को सुर्ख लाल रंग?

ऐसी मान्यता है कि चंद्र ग्रहण की रात सेक्स करने से बचना चाहिए. दरअसल, साल 2011 में एक इंटरव्यू में ज्योतिष और टैरो-कार्ड रीडर सोनिया भगिया ने कहा था कि हिंदू शास्त्रों में इस घटना को बेहद प्रचलित मुद्राओं की सूची अशुभ माना जाता है, लेकिन विज्ञान के नजरिए से देखा जाए तो सेक्स का चंद्रमा से कोई लेना-देना नहीं है. बावजूद इसके कहा जाता है कि अगर आप चंद्र ग्रहण के दिन सेक्स करते हैं और इससे आपके भविष्य में कोई परेशानी आती है तो यह आपके इस फैसले का परिणाम हो सकती है.

वैसे पापों को धोने या राहु के दुष्परिणामों से बचने के लिए अक्सर ग्रहण के बाद स्नान करने की सलाह दी जाती है. खासकर गर्भवती महिलाओं को ग्रहण के तुरंत बाद ठंडे पानी से स्नान करने की सलाह दी जाती है. इसके साथ ही कहा जाता है कि ग्रहण काल के दौरान भोजन करने से भी बचना चाहिए. यह भी पढ़ें: Chandra Grahan 2022 on 8 November: भारत में कब और कहां दिखाई देगा पूर्ण चंद्रग्रहण, यहां पढ़े पूरी डिटेल

बहराहल कुछ स्व-वर्णित आधुनिक संस्थानों का दावा है कि चंद्र ग्रहण के दौरान भोजन अगर पराबैंगनी और ब्रह्मांडीय किरणों के संपर्क में आता है तो उस पर नकारात्मक उर्जा का प्रभाव पड़ता है. गौरतलब है कि चंद्र ग्रहण के दौरान क्या करें और क्या न करें से जुड़े कई मिथक प्रचलित हैं. जैसे- किसी जानवर पर न बैठें, भगवान का जप करें, लेकिन देवी-देवताओं की मूर्तियों को स्पर्श करने से बचें इत्यादि.

रेटिंग: 4.33
अधिकतम अंक: 5
न्यूनतम अंक: 1
मतदाताओं की संख्या: 484
उत्तर छोड़ दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा| अपेक्षित स्थानों को रेखांकित कर दिया गया है *